२] स. बचा है रामय, भागवत, महाभारत, हरिवंश. भगवद्‌ भीता जने प्रन्थौका , साराः भी इसमे धिया गया है स्वयष्स पुराणम दी को विरेषताभों ्काजो पिवव्ण दिया गया ह, उसमे दका महत्व वलति ष्‌ कहा दै--

ष्वेदन्त का विपय दसत इतनी उत्तम रीतिनेर्गित दैङकिखउसमे वद्कर भन्यव्र कहीं नहींहै। पृगणोपेमी ण्टर्मवत्तिमि है। स्दद्तना उक्ृष्टटै किस्त दुलंम वत्तु संमार मेभ्रन्यवोई नहीं) षस श्राय महापुराण" मे सव विद्यः बतलाई गई मल्म्यावतार स्ति प्रारम्भ करक सभौ प्रवतारों का वणन दसम है 3 गीता, रामायण, ह्वंश, महाश्यरत शादि , का परिषय दे दिया गयाहै। वंवणव-प्रागम का र्मे पू्ुरूप भे विवेचन किया गाह, उसी पूजा पटति, दीक्षा, विधान, प्रतिष्टाविधि, पर्विरारोहणं काक्रमश्रोर प्रतिमाके लक्षण भादि सववरतेनदसमें दो गर्ह मोप्र्रीर मोक्ष देने वाति मनर भी इसमे बतलाये है इसी प्रकार शेशागममेदिवकी " परचेता पद्धति, प्ति-प्रागममे देरी को उगसना, सौरश्रागमतें सूं री. ` पूजा कः विषय प्रकट किया गयाहै1 प्रतिं निरूपमे ब्रह्मण्डकालूप दर्शाया गया है, समस्त मुदनो, दीपो, व्यो, नदि, तीर्थो श्रारिका वरन क्रिया गय! ज्योति चक्र, ज्योतिष विद्या, युद्ध में जय प्राप्त करनेका दाख, मन्वन्तर चारो वो के ष्म, प्रशोच, द्रव्यगुद्धि, प्रायश्चित्त, राजे, दान-धर्म, ` प्रत, व्यवहार, चागो वेदो का विधन, सूर्ंवंश, सोमवक्, धनुवेद, व्यक शखर गान्धरवे-वेद, भ्रयेकास्व, मोमांमा, नेय, छन्द, व्यकरण, प्रलद्धार, निषण्टु शिक्षा, कान्य प्रादि सव कुद इसमे मौजूद है ।"

इसपर सन्देह नही कि प्राचीन समय मे जव्जिप्रन्ये बहूत कम मिलते

ये, अधिकांश पुस्तके लग्‌ याददहौ करलिया करते येभ्रीरजो जितत विपय

फोजाननाथा वह उमे द््गो कौ वहत कटिनाई से बतलात्ता था, उम्‌ समम

पतने विषयों का ज्ञान एकत्रित बर सकना एक बहत बद्री सफलता प्रौर लौकदित

कोक्ा्ये या। जिपी एक म्न्य मे सभस्ते उपयोगी विपयों की जानकारी या मूचनापे मिल जाना कम महत्वकीबातनदीयो।

तदद्चान का पिवेवन-- जसा इम पुराणके माहास्य मेंकहाग्याहै इसमें वेदान्ड घंदंधौ विदेचन विश्वार के माय क्रिया गया है, जिते सामान्य ज्ञानवावा पाख्कभी उसका तत्त ग्रहण कस्सक्ता दहै 1 शरोरभ्रौर परात्मा की पृयक्‌्ता पर विचार कैरते टृएु वततनाया है क्ि--चक्षु मादि इन्द्रिणां मा.मा नही हो खक्तीं क्योकि ये करण { यन्तर } के समान है! मन मीर बुद्धि-मी भाता नहीं है क्योकि ये दीपककी तरह मा्न-दर्घन के सान ह! प्रण भी म्ात्मा नहं हो स्ता,

* बोकर स्दधनावस्वा मे उसे नटीं जाना जावा इमतिये इन्द्रिय भादि भ्रासमा महीं है बर्‌ यह्‌ कहना चाहिए करिये सद आत्माकेर्हु! चिख प्रकार यह देह भात्मा नहीं हो उक्ता उपो प्रकार भटद्धार मी भरात्मा नही कहा जा सकता { श्न छमस्त देह, ईदरिथ्‌ जादि से पृथक्‌ यह श्रात्मा सवके हदय में स्यित होती, है। मननश्यौल मुनि को समावि के म्रारम्मिक्-कालमे इनौ प्रकार चिन्तन करना चादिए, क्योकि ब्रह्य वे माकाश, भराक्गादय से वायु, वायु से अग्नि, भ्रग्नि घे जल प्मोरजनसेपृथ्वो होती हे! इषकरे पश्चान्‌ सूक्ष्म दारीर होता है प्रप श्वीङ्ृप से प्रचीकृत भूत ट्ए्‌ {जो स्युल शरीरके कारण है") इमे

स्थुल दारोरकाध्यरान क्रे ब्रह्यमे लय होने क्रा चिन्वन करे ।'

दु प्रकार पुराणङ्गार ने सूक्ष्म भौर रदूल श्रहृरिके पिकासका प्रति

सन्तप्रमे जो क्रम वत्तनायाहै वह सभो प्राचीन खोजोश्रौर माधुनिक विन्नान के अनुद है! मभौ ने पञ्चतो की उत्पत्ति नाकाश ते पृथ्वौ-तत््व तक मानो - दै भ्रौर चेठन्य ( ्राव्मा } को उत पृथङ्‌ स्वीकार किया 1 यहु जीवात्मा,"

परमात्मयाक्दी मद्य दै भोर मुनि, पि, समर, नानी व्यक्ति जो दरदं जप, ध्यान समाधि प्रादि करते उका द्दुदेद्य स्यल शरोर सूष््म जगत दोनो कं वन्वनसे द्ुटकारा पाकर भ्रपने वास्छविक स्वसूप-- ब्रह्म" को प्राप्न -क्रलेना होना है शमङ् त्थि श्वमिपुरण' जन्‌-मायं को ही सत्य दतलात है " जःन-मायंको नी घत्य तलाः दहै! उतने स्ट कह द्विया है शि-र्य, रिङ्न ( सत्य ज्ञान दवाय ` ही प्रा \ होता ३, कमं { कर्मकारड } द्राय प्रात नही टोता 1“ यही सिद्धान्त “भगवत्‌ ( मीदा' मे श्वे वचदावा यवा टै-- #ि

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कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं व्यवत्वा मनीपिशः। जन्मृवन्ध विनिमुंक्ताः पद गच्छःत्यनामयम्‌ { २~-५-१)

बुद्धियोय ( ज्ञान-योग ) पर प्राष्द ज्ञानीजन वर्मो से सम्बन्धित फन को व्याग कर, जन्म-मरण रूप बन्धन से छुटकारा पाकर, निर्दोप (प्रमृत मय) कोप्राप्तहेतिरहै\"

श्रमे पगे चल केर उम ध्यान, चिन्तन को बतलाया गयाहै जिसको भावना जगत्‌ मेद्दृकरलेने से मनृप्य शरीर-भावस्े हटकर प्रात्म-मावमें प्यितत हो सक्ता है उसका उदेश्य यही है क्ति साधर प्रत्येक स्थूल भौर मूक्म श्रवस्या ते अ।तपस्वषू्प कौ पृयक्‌ सममे कर सातारिरू प्रपच्चो कात्यागकरे। प्रकार के चिन्तन का एक नमूना देविये--

मै ब्रह्म परज्योति हं जो श्रोत्र, त्वक्‌ ओर चरकषुसे रहित है ब्रह्म. परज्योति जो सव प्रकार गन्ध, स्पश भ्रोर शब्द से निवजित हँ पर ्रहमषर ज्योतिदरजो प्रण, भ्रपान, व्यान, उदान, समान-पाचो प्राणोसे दिते है भै ब्रह्मं परज्योति जो मन, बुद्धि, वित्त योरे श्रह्दुारसेद्ञ्तिह,र्मब्रह्म परे ऽ्पोतिह जे जरा, मर, दोक, मोह, भूख प्यापत, स्वपन, सुधृति ध्रादि समस्त धवस्थाथों से रदितहै। ग्रह्यपरज्धोतिं है जो कयं कारण से विव- जिति ट॥ वेवत्त नित्य, शुद्ध, वृद्ध, मुक्त, सत्य, भ्रानन्द, श्रदवय ब्रह्य ॥"

प्रद्र प्रकारकी भावना ङक्ेवल कथनमाव्रसेद्ृदृ नहीं होतीम वद निभो के उषदेधा मे एकाएक प्रा्ठदो सक्ठोहै। पूवं जन्पोके साधकप्रौर योम मम्यक्न भ्रपवाद स्वल्प चोदरे व्पक्तिषयंकोषछोडकर देप सवनो हत धरवर्या तक पटने के लिवे करमशः दी शम्या करना पडता है। इसोलिये धर्मत्तध्वो परं देकारापन, पूजा, उप्राघना, द्रत, उपवास, दप, तष, ेराग्य, न्याम षि को उनेकः विधियां बतला गई है जिनमे से प्रघयेक मनुष्य पने स्तरे धनुदूक साधनको प्रण करके भरास्मोत्श्पके मग पर्‌ प्रग्रपतर ह्यो एकता है पम्ड मेष्ठत-रियिति को्र्त करसक्ता टै 'भनिनिपुराणुने

1]

अर्णो प्रुत हृ मौर्य का प्रयग "गमयिता नेता-मृडन करने वाना केश्यं परे जिया गया 1 इत प्रार्‌ मगः रब्द का प्रथं पु देयं, वयं, यक, शरी, दान श्नौरवंराण्य होतादहै) इम प्रकार "भवान्‌" शषब्दहरि या द्ष्छुको ही प्रकट करताटै, वयोक्रि उपयुक्त छः देश्वयं उन्दीमें होते! श्राशियों की उत्पत्ति प्रतय, अगति, गति, विदा, श्रनि कोजो जानता वही "भगवान्‌" कहा जा सक्ता ज्ञान की शक्ति, परमेश्वरे, वीये श्रोर तेज व्ह पूणं माव्रामे होति उसी के लिये "भगवानु" श्ब्दका प्रयोगं क्रिया भाताहै ।'

षत प्रकार श््रह्ममूत हरि'का ध्यान करने सेभौमन सापारिकं विषथोपते हट जाता दै प्ौर मनुष्य निष्काम मावसे संसारके व्यवहायोको करता हृ भी उससे निलिप् रदूता है 1 इष स्थिति का प्रम्याम करने के लिय "योगमार्गे" का प्राविष्कार किया गयाहि। दम सम्बन्वमें कटा बया है-

“मन को गत्ति काब्रह्ममे जो सयोगहोतादहै वही योग कहा जाता दै। जो स्थिर होकर समाधिमे स्थितौ लता वहु परत्रह्यको प्राप्तकर तेता टै दस लिये यम-नियम, प्राणाय।म, प्रत्याहार दवाय इन्द्रि को वशं मे करके ब्रह्मभूतं हरि मे चित्त को लगाना चाहिए वहं ब्रह्म, पूर्तं ( साकार) भ्रौर प्रभूतं (निराकार) दो तरह का होताहै। जते सनक, सनम्दन भ्रादि निराकार्‌ब्रह्य की भावनासे यृक्तयेश्रौर दूरे देवादि क्म की भावना वाज्त ये पर प्रारम्मर्मे रूप रहित ब्रह्मका ध्यान नहीं ङ्गिया जा सक्ता, निराकार परभन टिक नहं पाता दम लिये भूतं द्रह्मनाम दही सवं प्रथम चिन्न करना चाहिए “मदूमाव" फो प्रात हो जनि पर मनुष्य परमात्मा साय भेद रहितं हो ्ताहै।जोमोभेदहोतादै वहतो पतानकेद्वाराहौ हृमाकरतादै। जवति दहौ जाता है तव कोर्ईदभी मेद नही रहना 1“

चदे मनुप्य ज्ञान-मानेंष्षा प्राश्रयनेप्रौर चाहे षं मागे का, चाहे तिका ब्रह्मकाध्यान करे घटि वाकार कौ उपाघना, उसका शन्तम उरश्य घाह्मा प्रौर परमारमा कारयोगही होना चाहिए जव सौवीर मरेशने जह भन्ते प्राहमा ङे ध्रेयकामर्गंदृट्ातो उषने यहो कहा

° श्राप मुशे श्रेयः पृद्धं कर परमायं क्यों नहीं पृते ? सामय घो सदा परमां मही पिहित रतः है} है नृप ! देवो की प्राराघना करके भो षन-सम्पत्ति की इन्दा किया करताहै, पुवक्ी चाह करतादै, सज्यकी कामना करता है, उमदचे षया मनुष्य काश्चोयहोनाहै?लोकटृष्टिसे तो वह्‌ न्दी वातो क्योश्रोय समभ्ध्ना है, पर _विवेङक्षील व्यक्ति केवल परमात्माके साथसंपोग होनेकोही श्रय कहते! यन्न ध्रादिकीक्रियाभीश्रेयनहीं

हि मौर वहूत-सा धन षक्र करलेनामोश्रोयनङी कहा जा सकता परमां

भोदृष्टितेतौश्रर्माश्रोर्‌ परमात्मा का संयोग ही श्वे है वहू. भात्मा.एक्- घगपी, सम, धयुदध, निगु प्रकृति से पर, जन्म-वृद्धि प्रादि से रहित, सगत,

भ्रव्यय, पर, क्षानमय, गुणाजाति भरादिते ्रसद्ुरभ्रौर त्रिसुहोताहै + वर्शा्रम घम॑--

समाज मं रहने वालि उव मनुष्ये को श्रपने-पपने वरां भौर भ्राश्रमके नियमों का पालन करना भ्रावध्यक दहै) इसी से व्यक्ति मौर समष्टि क्त्या सम्मव्रहै) यद्पिश्राज परिस्थितियोंके बदल जाने तेहमक्रोचारवर्णोका विभाजन हानिकारक जान पढने मगा है मौर बाध्रम-षर्मेका पालन तो रष॒मव या प्मभ्यावहा।रिकं होषही चुका है, पर एक समययाकि इन्दी कैः ध्राघार पर हमारा देश संद्र मे सर्वो पदवी पर विराजमानयथा प्रौर विद्या, क्ता, यरता, उदारता श्रादि सभी गुणोमे प्रादय माना अत्ता या श्रनि पुराण मेचारो वर्णं भ्रौर चारों ्राध्र्मोके धमं काजो परिचय दिया गया उषमें त्रितनो ही महत्वपूणं बाते ठेसी जिनका श्रनुकरण वतमान समयमेंभो समाज को उच वनानि वाना छिद्धहो सक्तादहै ।वंसेत्तो इम समय यन्वोंके प्रचार श्रौर वडे-डे कयरखानों मे जनोरयोमो सामग्री कानि्मणि होनेकी प्रणाली से समाब्रकी काया पलटहोदही गई दहै, प्रोर्‌ भ्रव प्राचीन "सामाजिक संस्थाश्रो प्र पृनूर्जाविन हो सक्ना सम्भव नही रहा! वोनी उनमें से जितनी यातं यतूिन्धिनु परिवत्तेन करके समयानुकून वन स॒ककेतो उनसे लाम उठाना हमा क्थ्य टै इनमें स्वने मुस्यब्रह्मवयं-प्राश्रम हीदैजो व्यक्तिप्रौर

समाजके लिये (नीव के पत्रः कोतरह थाप्नौरप्राज नितकी बड़ी दुर्दशा हो रही है) ब्रह्मवे के नियमोकी कुच विकिप वातेंये है--

श्राह्ए का उपनयन भ्रोर ब्रह्यचयं तथा प्राधम-प्रवेश् श्रावये वपं मे, कोतिय का स्यारहवे मँ तथार्व॑स्यका बारनरवे वेषं होना चाहिए गृरुका कर्तव्यहैकि दिष्य क्रो सवप्रयम सच ( स्वच्छता) भौर प्राचारकी शिक्षा दे प्रातःकाल भ्रौर सायंकाल संच्योशसन तथा हवन प्रादि नित्य कमं करे लौर कभी भ्रपविवनर्है। किषौप्रणोकौ हिषा ( मारनाया शारीरिक भ्रयवा मानिक कष्ट पहुचाना } अथवा दूषरो कौ बुराई करना, विशेष स्प घे मदलील शब्दं मुख से निकालना निषिद्ध है 1“

हस प्रकार हणो शिक्षा का परिणाम यह होताथाकफि विार्थी रिक्षा भ्रात करने के पञ्चात्‌ एक षुपोग्य धरोर सम्य नागरिक वने के योग्यहो जाता था 1 उतत समथ कित्तावी दिक्षा का स्थान गोण या, भौर भविक च्यनि इस पर दिया जाता याकि व्रिद्यार्थो कंठ श्रौर जोवनमे धोरता-वौरता प्रदशित करने वाला वेने संभव है उस समय शिक्षा काकषेत्र वतंमान समयकीश्रपेक्षा संकुचित रहा दो प्रौर भरधिकाग विद्यार्थो साधारण घमे-क्मं कीश्िक्षातथा ध्यावहारिक-जीवन के लायक लिखना-पढना, हिसषाव भादि सील करटी सतार भे श्रविष्टहौजतिहो,परवेजो कुष सीवतेये वहु टो्रओर भाजीवन साथ देने लायकं होठा था जव कि वतमान समय मेकहनेकेलिये तो दस बारह वपं कै कच्चे भो सारितेयपणित,इतिहाव.भूगोलप्रयंशाख,ममाजज्ास्त आदि प्मनेक विपयों का नाता" बना दियाजाता है, पर वहु उनमेसे प्रधिकाश विपर्पोकोर्बूग ते निकलते ही भ्रुल जाता है ओर जीवन-सघपं मे सफल हनि को दिशामे उसे बहृतही कम उपयोगी ज्ञान प्राधूनिकस्कूलो भौर कािजोते मिल सक्वा दै 1 इतना हीनरींभाज कलकौोये रिक्षा संस्याहुः तो मनेन यंस भौर दुरावाो का शिण देने बा स्थल वन गई जिनका विपमय परिएापर हम पराशरकल दैः नवमुवङ़ विद्याियो के रदूम-तदन पे प्रत्यत देत

ष्टे।

क, ~

गरदस्थके सम्बन्य में विचार करने पर्‌ उमम मी पूवविभ्नावरुदियांदही भ्रधिक दिाई देनी है 1 उप्र ममय गरहृस्य सामान्यतया रेषे नियमों पर चलते ये जिनसे खमाज मे युष, यान्ति श्रौर सुव्यवस्या का समाद होतया यद्यपि उ¶ धमय प्राड की तग्ह कानून, श्रदाचतों परर पुलिम मादि को इतनी विश्न व्यवस्यानही थो, तो मौ लोग भ्रपने सामाजिक-घमं का पालन करके भ्राज की प्रवेला कहीं प्रधिक्ं सुखी भ्रौर सन्तुष्ट जोवन व्यतीत करतेये। इम प्रकार के धाप्मिङू-जीवन का विवेचन करते हुए पुराणकार ने कहा है--

"धमे वही है जियते मोग ओर मोक्न--दहलोक मौर परलोक दोनों का सुख प्राप्त हो सके 1 वैदिक धर्म दो प्रकार का है--एक प्रवृत्ति प्रधान भौर दूमरा निवृत्ति प्रधान जो क्म किसी कामना ( इच्छा} के हदय मेँ रखकर भ्रमं क्रिया जाता है वह श््रवृत्ति' वाना कहा जाता दै प्रौर ज्ञान के माष जो कमं क्या जावा है वह्‌ निवृत्ति वाता मानागया है वसे वेदो का्रम्पास तपश्चर्या, ज्ञान कौ प्रानि, इन्दियो को कव में रखना, हिसा करना, गुद्जनों को सेवा करना प्रादि कपे सदव कत्याणाकाी मानेग्ये इन समस्त क्म मे भ्रात्म-ज्ञान प्रास करना सर्वेश्रे्रहै वह सम्पण विचाप्नोभे धिरोमखि दै खोर श्रमृतत्व प्रदान क्सने वालाहै। संमारक्ते समस्त प्रागियों में प्रपने सापको देवनः, भर्पा्‌ सदको प्रात्मौयकी तरदे समना पोर उनके सुखदुः छो प्रपते ही मुख-दुःख की भांति अनुमव करना मनुष्यत्व की सर्वो्िष्ट॒स्थित्ति है भ्रौर यह सवेचि परलोक गति प्राप्त कराने वाल मानं है 1"

समाजमें रहने वाने भरत्येह गृदुष्य को श्रपना देनिक कायंक्रम जि प्रकार रना चद्िए इसका उष्देग करते टृएुक्हाहै हि--श्रहममुरूतं मेँ पेयाय उटकर दृष्टेव कास्मररा करना चाहिए ! मन-मूव कात्याग दिनके समय उत्तर दिशाकोतरणमुह्‌ करके करे प्रोर रात्रिक समवदक्षिक्वद्विगा षो तदप मु करके भागे, कताय के समीप, चरागाहु अदविमे कमी मन प्यागनष्रेन्निटरौ से शुद्धि करर कृल्सा-दतुन करे प्रातःक्ान स्नान बन्दना भावदयङ टै! ठम ममय मायवो भ्रादि मन्व नो जपकरना मी उकिनिरै शो षोम्माउ्याङ्ग्ञार्हादो, गरभेवतोस्वोप्रारटीहो प्रवादो गुरुजनप्रा

१० 1

रहाहौो मागं छोडकर ऊहे प्रथम जनि को रुला देना चादिषु 1 स्नानादि के समयि नम्नस््ीकोकदापिम देते! सवदा मुलक्ते मदर-मद् प्रयत भद्धलकःरौ णष्द ही उश्वारश करना शादि अनिष्ट याप्रमद्रषयन मृते नेही निकालना चाहिए जो फो भी हीन धषु व्तिर्होया होन पियति वाते उनकी हनी नदीं करनी चदिए मलमूत्र भादि कैवेगको रोकना सया स्वास्थ्य कते सम्बन्ध में प्रतय प्रकारसे लापरवाहो कश्ना भरनूचित है1

हस्थ.प्राश्नम सवं प्रधान, गौर समाज को उक्ते वनाने याक्ती नमस्त ्रवृत्तिणे का भ्राषार है बाजकल तो समाजनक्ल्याएा की भविक प्रदृत्तिया सरकारने प्रपने हाणमेत्तेरली ह, पर उनमे वेतन भोगो कर्मचारी षर्तष्य- निधराका कितना कम पालन करते यह हम समको विदिततहै। पर प्राचीन फाले ये कार्यं प्रायः सम्पन्न गृहस्थो द्वारा या उनङ़े सहयोग तेजरियि जतिये प्रौर उनमे प्रायः सची सेवा-भावना का परिचय भिलतता था इमीलिये मानव धर्मे प्रादि व्यास्याता भगवान्‌ मनुने भी गृहस्य भराधम की मुक्त षण्ठसि प्रशंसा की है- यथा वायु" समाधित्य वतन्ते स्वंजन्तवः तथा गृहस्थमाधित्य वतन्ते सवे श्राश्रमाः यस्मात्‌ त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहुमू 1 गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येषठाश्रमो गृही संघार्यः प्रयतेन स्वगं मक्षयमिच्छता सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुबेन्दियै प्रयातू-' जिस प्रकार समस्त प्राणी प्राण-वायु के भ्राचयसे जीवित रहते है, उमो प्रकार गृहस्थ प्राश्रपके प्राश्रयतते श्रन्य सव श्राश्रमो का निरवदि होदादै। ये तीनो प्राप्न ग्य को सहायता से अयना जीवस-निर्वाहि करेमे सरमरथं होते है इसलिये यही प्राणम सन्ते बडा माना जाना चाहिए! जो व्यक्ति पारलोक्िकिक्त्याण कौ दच्छा रखते हैश्रौर षस संसारपेभी सुष्रोगमोग चषट्ते उनो सद प्रतेः पूर्वर गृहस्य-ममं को धारणा कसना

{ ११

शहिए, इु्व॑ल-दद्रय र्य जौ इद्धो कौ व्ीभूत क्सेम श्रसमथं है, इष भाश्चम के करत॑न्यो कां पालन नहीं कर सकते !”

गृहस्य श्राश्रम का पह एक पेएश्राद्ं है श्रोर जिद च्या समाज भै रेपे कतंत्यपरायण मदुगुदरस्थों की बहुतायत होगी वहु प्रवर्य उश्रति के पथ पर प्ग्रमर होगा वतंमान समय में यपि धन तथा साधनों कौ वहत प्रचिक वृद्धिहो मर्ईहै, पर श्राजकल साधन-सम्पन्न लोय समाज के प्रति श्रपने उत्तर- दायिष्व का वहत कम श्रनुभव करते है वै श्रपनी शक्ति प्रौरसाधनों को श्रपने श्रीर्‌ श्रपने परिवारकेही सुखोषमोगमें ही भ्रधिकसे भधिककाममे घ्राति श्रौर यदि समाज-कल्याणके कार्यों कुष्ठ माग लेतेभी हतो उस श्रपन({ वोर प्रसयक्ष श्रथवा अप्रत्यक्ष स्वाथं अ्रवदय रखते \ यहीकास्णरैक्रि दस समय समाज में श्रसंतोपप्रौर श्रशान्ति की निरन्तर वृद्धिहोती जापीदै। यदि हम ्रपने व्यवहार में प्राचीन दर्शो कोमीस्थान देते र्हं तो इससे वतमान स्थिति मे बहत कुद गुघार हो सकता है

यह भौ कहा गयादहै कि जव “गृहस्य प्राश्रममे रहते हृएपूत्रकेभौ पत्र ( मर्था नाती ) का जन्म हो जायनवे मनुष्पकोघरका बन्धन लयाग कोर वानप्रस्थ श्राश्रम ग्रहेण कर लेना चाहिए 1 प्राचीन काल में जबेदेशमें जद्धन प्रर बनोंकौ श्रधिक्ताथौ श्रीर उनमे प्राप्त सामग्रीसे व्यक्ति अपना निर्वाह करके स्वेतन्व्रतापू्वंक लोकोपकार्‌ के कायं कर सक्तेये, तव वेहाही द्विधान बनाया गाधा पर वतना समयमे वनोंकाप्रभावहो गयाहैग्रीर जनसंल्या की प्रतिवृद्धि के कारण तरह-तरह के उपाणों ते प्रत्येक घटिया-बद्िा भूति जोत्ती-यौद जा रहो है, इखलिये श्र वानप्रस्थो के लिये बलवारी होना सम्भव नदीं र्हा

~= किर भी इष प्राश्रम का मूल स्म्य प्रीर उत्करा उद्देश्य वदत

उत्तमश्रीर इलाघ्यहै। गृहस्य-ाश्रममे साधारण स्विति.के व्यक्तियोंको अपनी श्रविक दाक्ति श्रपने परिवार श्रौर निकट सम्ग्न्प्रयो के अरण-पोपणमें ही लगानो पड़ती प्रौर समाजसेवा का श्रवस्तर उप्तको वहत कम मित्त पाता है, इसलिये धरमे पृतं के सयततरहं समथंहो ताने पर मनुष्य को प्रवय

१२ 1

श्रपनी वायप्राली बदल देनी चाहिए प्रौर गृहस्य का भार पूवो कोदैक्र स्वयक्तमाजको निःस्वायं मोर निःवुन्क सेवा च्रारम्म कर देनी चाहिए हनी प्रकार जन हितकारी कर्मो मे सहयोग देने से मनुष्य समाजे श्ण से उर ही सकतादहै।

श्मध्ाम का सार

ध्रन्त भे सघ ध्मोकेसारमे यही ब्रतलायागयाहैकि "जोप्रभु हदय दीपक की भाति प्रा्माके ल्प्रमे षते उपो शाध्यान कषना वा्िए्‌ पद्‌ मत तथा दद्दिपो कौ सातारिक दिषयोसे हटा कर परभायं मेँ लगाना चादिए्‌ 1 पपन मूते फो विभिद्रप्रकार की स्वाथे युक्त गर्तो ते श्त करके माह्माको परमा्माके ध्यान मे लगाना हौ उत्तमयोगहै। जो दन्द्यं बहिमुखी होती ्रथा्‌ साक्तारिकं विषयों की मोरप्रवृत्त हमा कसती, उन इन्दरिपोको प्रस्तमूखी करके मने ही लगदेवे श्रौर फिर उष सनको प्रात्मा ने योजित कर देना चाहिए इस प्रकार विषयो द्टुटकारा पाकर परम तत्का ध्यान करना यही सव्रते वडा लक्ष्यहै, हेय सवद्वातेतो प्र्योकाविन्तार करने वालो है इस प्रङार जिस ब्राह्मणने इष कतव्य ( परमाय) का शणं पालन किया है उसने उपवास, प्रन, स्नान, तीथं, तपन सवका फलं प्रास कर लिया देषा सममो एङक्षर्‌ भर्यातु 2 परम ब्रह्म है ओर प्रा

सामपदमतपहोवाहै ब्राह्मण के लिये गायत्रो से वढकर कृन्हीदै, वह पवित्रता प्रदाने कलेर्पे सर्वश्रष्टहै,”

प्रध्यास्मका प्रथं लोक सम्पकं कात्याग कर किसी निर्जनस्थानर्मे जा बैठना कदापि नदी हि) वहाँ सिवाय परत्वर, पिष्ट के परमात्म कहु दिलाई पडेगा ? उका निवात तो विवेकृ--युक्त मानवों के भीतर ही है "प्रौ उम्होके म्पकं मे रह कर उसका एान्निष्य प्रप्त श्रिया जा घक्ताहै। कहा मपा क्कि परमात्मा ब्रेम-स्व्प, कथ्णा-स्वसू्प है तोज्रेमश्रोर कश्णाका भाषतो हृदयमे तभी स्प होगा जब उसका कोई पात्र सम्मुख उपस्थित दोषा! दसलिये श्रष्यत्मवाद का प्रयोय श्रोर उसकी वृद्धि अन-समाजमें रह

{ १३

करदह सम्भव है श्रौर प्राचीन छपि तथा मध्यकालीन सन्त इसी ्राव््यंको समाज के सामने उपस्यित करते भ्राये है! पुराण श्रादि समी षमं ग्रन्य भो यही उपदेश देते हँ कष्ट पीडित, भ्रमाव ग्रस्त प्रारियों का उपकार क्रनादही सचा घमं श्रीर्‌ भ्राष्यात्मिकता का परिचायकदहै।

उदारता का दषटकोण--

कई साम्प्रदायिक पुराणो मे धर्मं विययक प्रश्नों पर बहुत सशीणंता श्नौर क्टुरताका परिचय दिया ययाहै, पर यहपुराखदइम हटिततैकापी उदार है! इममे क्रिमौ सम्प्रदाय भ्रौर उसङके इष्देवकोनतो बहुत अधिक बढ़ाया गया दहै श्रौर गिराया गया है विष्णु, शिव, शक्ति, भूरे, गणेश सव कौ पूजा, उपासना का इममे समताके भावस वर्णेन करिया गया है। इमे सवसे बड़ा नाम परमात्मा--परब्रह्य शाही माना गया है, जिसने कोई सम दर इनकार नहीं कर सखक्ता।

यही बात इसको प्रायश्चित्ततथा विभिन्न बुद्धयो के परिमा्जंनके सम्बन्ध में दिखाई पनी है इसमे विभिन्न दोषों के जोप्रायश्ित्तदिये गये वै प्न्य म्रन्यों की ्रेक्षा बहत सरल दहै मोर भरन्त में यह भीक्हषद्धिया गया है--

“परदारा, पराया घन मौर जीवमा का कोई पापवनप्टेतो मनुष्य की शुद्धि का मुख्य प्रायश्चित्त भगवान्‌ की स्तुति होता है “विष्णवे-विष्णवै- विष्णवे नित्यं नमः' यह वहे, प्रयातु मगवानू विच्णुके लिये मेरानित्यदल नमस्क्र है चित्त में श्थितत रहने वाते विष्णुको्मै नमस्कार करताहं ओर अटंकारमे रहने वने हरि को प्रराम करता हूं | चित्तमे रहने वन्ते ईश को, जो श्रव्यक्त है, प्रनन्त है, भरपराजित है उनको मेरा नमस्करदहै। पृरांवया पुडनीय श्च्णु को नमस्कार करता हूं प्रनादि निन रौर विभु मभवानूको मेरा नमस्कारदहै। वद भगवान विष्णु ध्यान श्रिय जाने परपप काह्रण क्रिपा करते स्दप्नमे भो देखे जाने पर मावनामाव्रसे वेपापकीद्ुर करदेते उन उपेन्द्र दिष्णुवोजो प्रणतोके दु-खको दुर करने वलि,

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मै प्रलाम करता है दत निसधार जगत्‌ मे जो कि नोचे अन्धकारे दुक र् हाय का प्रवलम्बने स्वरूप परात्पर विष्णु ह, उनको प्रणाम करतां | हे षब ई्वरोमने भी ईश्वर! हे विभो! हे परमास्मय्‌ ! हे श्रधोक्षज { दे हुपो- केश ! वुम्डारे लिथे बारम्बार नमस्कारै हि निदे! दै भोविन्द ! भून भावन ! है केशव] जोमीमेरी दोपधुक्त ब्तिह्योयाकोई प्रपहो, उमरे दिना ध्यान तरवे श्राप शन्त कर देवं 1“ इसस्तोत्र कोनोभी कोद पढतादहैयाश्चवण करता, वह्‌ शरीर, मन प्रथवा वाएीसेद्ेने वात पापोंसे निद्चयही भृक्तहोजत्ताहै॥'

सी प्रकार श्रन्य स्थान पर लिखा टै करि--"भगवान्‌ हरिकां स्मरणं करतेसे घाद को$ षस्कार शियः हुमा हो या भरसंस्कृत हयो सदका मोक्ष हेता म्रौर स्वगं को प्रति भी होतो है 1" दषा भ्रथं यह नही करि इसपे लोगों कौ पाप करने की भिल जातो या पपि-प्रवृत्ति को वद्वा दियाजा रहार वप्तू इका ष्लय यहो है कि जिषव्यक्तिके विचार शुद्र, पर क्रिसी परिस्थिति प्रयता प्राङस्मकं घटनावश्त जिससे कोईदोप होगयातो उसको स्मृतयो मे वतलाई मई बहुत लम्बौ रौर ल्ल प्रायश्चित्ती भ्रक्रिया मे डति बिनाहरदिक पश्चत्तापसे पुनः शुद्ध होने का श्रवसर दिया जाय, श्रौर विचार कियाजाय त्तो वास्तविक प्रायश्चित्त यही दै घन खचँ करके पडत, परोहितो द्वास प्रायश्रित्त का विधान करानेमे तो दिखावा ही भ्रधिक दता \ फिर प्रायश्चित्त सम्बन्धौ (्र्णय का दूसरा पहलू विक्ेप परिस्ितियां मी 1 जते पु प्रथवा उष्द्रवोके तमय दहूतसे ख्ी-पुरुपो के घमं जबरदस्ती नष कर दिये नाते है। मूखं प्रौर स्वार्थी परिडित' देवे अ्रवधरो पर्भो वको एकः ही णक्डी ते हाकने' की जिद्‌ कर्ते है यथपि इते देश पौर समाजका धोर क्रषस्याग्‌ होता है पैनी मूखंता के परिम स्वरूव मुसलमानी शासन- कालर्ब सल्लोनरनारो दन्टर-समाजसे पय्‌ हो गये भौरभ्रागे चल कर उन्दी के वशर दिन्दर-समाज की उड़ प्र दृत्टरद्ा चलाने वाले यने।

ध्मसेम्दन्थ परे एर नदीं अनेक उदान िनू-तमाज ङे मौजूददहै। उतर प्रदे तवा राजस्थान सीमा सोप रद्ने नदति क्ट लाल मलखाने

ष् भ्रोर मेव इसी प्रकार हिन्दू-सम्रःजसे पृथक्‌ कर द्यिग्येये1 उनके कुपोंमे मु्चमोन भ्राक्रमणकारियो ने गोमा फक दिया रौर मूल से अथवा विव हकर उनक्रा पानी पी लेने से उन सवको दिनदू-षमाजसे बहिष्न मान लिया गया महाकवि रवीन्द्र नाप ठङ्कुर्के पूरवजोंमेसे {किमी कौ जवर्स्ती चाद दाहकाषक्षाना सुःचाया गया, इस पर लोगों ने उनको समाज-वर्िष्कृत मन्न लिया श्रीर्‌ ब्रह्य-खमाज सम्बन्धी विवाद में देते “मूर्खो, ने कहा रि देवेग्द्रनाथ ठकुर ( रवीन्द्रनाय पित्ता) तोनाम केही ब्राह्मण ॥' एते मूषेजो अपने हठ के श्रागे समस्त दनद जाति को हानि पहुचाने में सद्धोवनदींकरते दाप्तव पं स्वय सक्ते वडे पापौ है 1 "पत्नि पुरारे" में दस प्रकएरको घटनं को उनके वास्विकरूपमे दे्ा गया है भोर उनका प्रपयश्धित्त वैसा दी सरल वतनाया है उसमे एक स्यान पर दरूपित स्तिणों के सम्बन्व में लिखा है--

वलात्का रौपयुक्ता चेदं रिहस्तगताऽपि वा त्यजेद्‌ दूपितां नारी ऋतुकालेन युध्यति भ्रयात्‌--"“यदि क्िसौस्त्री को कोई बनपूवंक भ्रष्टकरदे षयवा वह तुके हाय में पड़ जाय तो उस्र समय उत्ते त्यागदे। पर च्छनुकान ({ मातिक घमं ) हो जाने पर जव वह शुददो जाय तब उसे प्रदणक्रले! दसी प्रकार यदि कसो स्त्रीक भ्रन्य वणं देका मभ रह्‌जायतो प्रस्वहोजानेप्र रजोधमं द्वारा वहे फिर ुद्धहो जतौ है 1" यहे पुराण पति द्रा त्यागो हई प्रर विधवा स्तिया के पुनविवाहुको शास्त्र सम्मत वतलाता है ष्टे मृते प्रत्रजिते क्लोवे पत्तिते पतौ 1 पचस्वापत्सु नारोणां पतिरन्यो विघीयते मूत्ते तु देवरे देया तदृ मावे यथेच्छया ।1 शर्थात्‌--पतिके नष्टहो जाने, मर जाने, सन्या प्रहण कर तेने पर, क्लीव ({ नपुसके } हो जाने पर श्रौर पतित हो जने पर इव पाँच प्राप्ति दी श्रवस्वाभ्ों में स्मियो को सन्य पचि चननिकराविषानहै। पकेभूतहो

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"राजा कोप्रजाके प्रति सवदा देखादही र्ना चादिए जेर्गापिरी श्रौर सहषगिसी होती है वह अपने गर्नन्यित्त वन्ते ्रौर पति केसुलकाही सदा ध्प्रान रखती दै उम राजाके यजोंश्रर तपश्चर्शासे क्यालाम जिसकी प्रजादही रक्षिन्‌ र्दती हो \ जिस रजा की प्रजा मत्तौ-भांति रक्षित है उषे लिये गृह स्वगंकेसमानदहीहोनाहै। जित राजाकी प्रजा सुरभित एवं मुखी नही उसका मन्दिर भौ नरक तुल्य है प्रजा के मुङत भोर दुष्छृत दोनों का षया भाग राजालिपा क्न्ताहै प्रजा कीसुरक्नाक्सनेसे राजाष्मकी प्राप कच्ताहै ओौरप्रजाकी रक्षानकरनेसे पापक प्रात्तिहोठीहै।

"राजा को प्रपनी प्रजा के दछोडे बालकों की सम्पत्ति व्यवस्या पूरी दूमातदायै से करनौ चाटिए भ्रौर जव दे वयस्क हो जाये ग्रौर ग्ृहस्याश्नममे भ्वेदा करे तव वह उनको दे देनी चाद्िएु विवा मीर रोगग्रष्त स्तरिोंकी सम्पत्ति को यद्वि उनके सम्बन्ची हरण क्रे ठो उनको चोरके समान दण्ड देना चारिए यदि चोर क्रिमो की सम्पत्ति चुराले येतो उस्रकी पृर्तिराजाको स्वयं करनी चाहिए श्रौर वोरींसेरक्ला करनेकाजौ श्रधिकारीहो उसे करानी चा्िए्‌ चिस तरह पिता सपनो शरोर पृत्रकोरक्षा क्रियाकरतादहै उसी प्रकार राजा को भ्रपनी प्रजाकी रक्षा करनी चाहिए! राजासि संरक्षित श्रजा धर्मं करतौ है उससे रात्राकीौभ्रायु, घन वंम्व को वृद्धिह्ोतीदहै। राजा कंग जीवेन रज्यकेलियिदी होता है, इसलिये प्रजा का पूणं व्यान रखनेसेही राजा के जवन कौ सफनताहै। भररा-पोपणा क्रिया हुभ्रा वालक्र जिस तरह यनवागू कमे के योग्प होता है उदी प्रकार मलौ-मांति मरण क्रिया हुमराराष्र कन्तो होता है 1”

यद्यपि वतमान समय में द्यत्र धारण करके विद्धातन पर वेधने वाले राजा की परम्परा का जन्तहो गया है, किरभोजो कोई लासन-पद पर नियुक्त श्रिया गया हो उका उत्तरदायित्व प्रौर ब्तव्य राजाकी तरह दईै। इतना ही नहीं पटे राजा भ्र होता थाप्रौर मन्त्रिक हौनेपरमी प्र्येक्त विषय का भ्न्तिम निर्य बहंस्वयं करता था ओर इरनिये भ्रघयेक

श् ]

श्रच्चेबुरे परिखाम का बहौ एर खातर उत्तरदायी माना जात्ता था प्र भ्राजक्ल राञ्यकाकारये भार एक के हाय मे रहने के दजाय श्रनेक मन्विर्घो के हायोमेवेंटा रहता मोर इमलिये एककोनदीं सवो समानस से जिम्मेदारी होती है! परसेद हैकि भाज एक की जगह श्रनेक "राजा! होने पर्‌ भोध्रजाका जोवननतो सुखीहैन सुरक्षित वरन भ्रचिकांश मन्त्री प्रायः निजी स्वायं साधन के दोपी भी पाये जति दह! एषे व्यक्ति जनता के हित को कहां तकं परध्षितं रल सक्ते रहै इस सम्बन्व में दिदोप कहने की प्रामिदयकता नही 1 इसलिये यद्यपि हेम ॒दर्तमान समयमे एक तन्त्र-शातन पुरंतया त्याग चुके, तोमीन्यायबौ दृष्टि से स्वौक्तार करना पडताहैकिउ्सयुण मेनो राजा उपगरक्त राजं क) पानन करते ये, उनका सासन प्रजा के तिये ब्त मान जन-तन्र से श्रनेक गुना सुख-मुविधाजनक होता होगा 1 म्यों कै लिये सामान्य कल्याणकारी नीति--- ससार मे मनुष्णों के लिये सबसे श्रविक कल्पकारी मागें षर्मानुूत प्राचरणा करना हो है, “धर्मो रक्षति रक्षितः" कौ उक्ति हमारे यहां सदैव सव्य भ्रौर्‌ सर्वोत्तम मनौ गर्दहै। जोधमेंकापाल्लन बरेगा वह्‌ कभो प्रापत्तियो प्रयवा पतने कोप्रास्तनही हयो सकता! उत यदि सयोगवश कभी विपरीत परिम्चितियों का सामनानी करना पडेषातोभ्रन्तमे वहं पविक्येष्रता मौर ख्थप्दवीकोदही प्राप्त होगा स्वंषाधार्णको ठेते धमरचिरणा करमेके लिये दमम जो मगवःन्‌ एमके भ्रादेक्तो का पद्धुतन क्या गया है वह्‌ विशेष महत्व पूर्णा मौर च्यव्हरोप-ोगी है 1 भगदा राम लक्षण षो नौरि-षमं षी शिक्षा देते टृए क्ते है-- न्याथ्मे घन की शमा करना, उस न्यायाजित धन कराद्दाना यौर्‌ उमबदर हए पनको रधा करनी चाहिए ) इगङ़े पश्चात्‌ उ्यपनकाप्रयोग छयादान विभो सत्यत्र ठे करना विम्‌ 1 पतवर यही चार गत्यां ह्। मप (म्पा) कापर विनयता है) चास्वङे निश्चयवे विनय भ्राता है। पन्दिपो का जोतना भी विनय सम्पत्ति प्र ङ्रनेकै लिये चनेव गुणोषा

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होना आदश्यक होता है! श्र काङ्ञान, वुद्धि, धीरज, दक्षतः प्रयल्मता, घारणा, उत्नाह, वाग्मिता, उदारता, सदृस्लीलता, पविव्रता, मंत्रीभाव, त्याग, क-क्ता, शान्त स्वमाव, इद्धिय-संण्म-ये सव गृणा सम्पति प्राततिके रतु होते है स्वंत्र रेते हए विषय रूपौ जद्धल में दौड लगति हए दिपयो मे मग्न इन्द्रिय ख्पीहायी कोन्ञानलूपो प्रकुशसे वदाम करना चादिए्‌।

"काम, क्रोघ, लोम, हूर्पातिरेक, अभिमान, मद इन धड्‌ वभं का त्याग कर देना चाहिए दाषन-कत्ता को भ्रान्विक्षिज्ञो मौर प्रयी विद्याजों अर्यात्‌ घम- श्रवम्‌, वर्ता, दण्ड-नीति, नद-प्ननय का जान प्रह करन चाहिए बहन, मधुर~नापरा, सत्य, शौच, दया, क्षमा ये समस्ठ चारोंदणं वालोंकाभ्रोर चरो भाश्मों का सामान्य-चमे कहागयादहै) राजाका क्तव्यहैक्रि भरना प्रर एणं भरनुप्रह रगे सायु पुद्पीं भ्रोर सतपुस्पों का हिद-सावन सन्यरनो का प्रधान लक्षण दहै राजा को अपना सुखत्यायकर भी प्रजाके सुलके लिये प्रयत्न करना चादिएु सज्जनो भीर प्रिपजनों से तो सदुश्यवहार करिया जाता है पर साघु ब्रठधारी प्रषनेे द्रप रखने वालोके सायमी बटु व्यवहार नदीं करता जो सर्वदा प्रिय वचन दही बोलाकरते हवे देवता के समान माननीय हेते है ! इखके विपरी रूर वचन बोलने वते साक्षाद पगुही होते ह। गुरुजनं की पूजा देव्ता की भांति करनी चादिए भ्रोर मित्रजन का खम्मान भ्रात्मवतचु करना बाहिए प्रणिपात द्वारा गुरु रो, सदृन्यवहार द्वारा सेवको को, सत्कर्म घे देवतां को, खदुमाव से भितरो को, भादर सत्कार ते बान्ववोको, प्रेम सेखनोको, दान्ते निम्न वेगे वालो कोभ्रोर चातुरा भ्रन्य सव लोगों कौ म्रपने भरनुकून बनाये र्ना चाहिए स्वघमं पालन करते हृष दूषय की निन्दा से कचे, छण लोगों पर छपा रखे, €वघे मबुर वचन वोन्ने मौर जो सच्चे दिश्वासपाच्र मित्रं उनका प्राणाप से उपक्रार करे श्रपनो समृद्धिकौ दशाम घमण्ड नीं करना चादिए ग्री दूमरों कौ वृद्धि देव कर कमी द्रप-भावन रसे? दोपारोपख सिये जने पर रिष्युापूवंक व्यव हार करे भोर बन्धुगणों कौ सदंव सहयोगी बना कर रखे महानु परात्मा

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ञओ नियम दतयिगृधेषैश्रौरजौ (दमः आदि वदप नियम खनव श्रत" के रूपर्म पालन करना ब्त ब्ड़ा तपहोताहै।ये इच्िमों कोव््पे रसने मे बहुत सहायक हहे ओो ब्राह्म्य परिस्थितियों वद्य न्नन्नि होत्र भ्रादि दिक कर्मो कोष्टोड धु उनके लियेये श्रः ही चपधर्याका उटूश्य पय करदेतेै।

प्रत कै समय प्रान श्रौर स्थ्री-सदिवामत्यान देना यादहिए। उन

ममय पष्प, श्रलद्धुर नधन वस्त्र भादि कामी प्रयोगन ररे बहत भविक लल पीना प्रौर दिनम सोता नियम विष्ट) धमंके दश ल्षणन्हेगयेह उनका प्रेतक्ाल मे च्यान पूरक पालन करना चाहिए वे दश लक्षण दस प्रकार है क्षमा, सत्य, दया, दाने, शौच, इन्धिय-संयम, दैवभुजा, अ्रग्निहरण, सेतोप, श्रस्तेय ! उपवास के दिन पविध्र मन््ोकालजपकरे धरोर सुविधा हिवन भौ करे

पुराणों मे श्रधिक्रौद व्रतत कामनाप्रो करौ पूति करने बति ठी वते गये 1 एक पूराणंमे तो वैस्गभों के चिये भनरङ्गदान-व्रतः का भो विवान वरिष्तार पूवक दि गथाहै! एक प्न्य व्रतमे विष्णुं भगवानु ते यह प्रार्थना की यई कि--“जिस प्रकार शवापकती संय्या सदैव लक्षमीजी ने प्रयून्य { युक्त ) रहती हि उसी प्रकार भेरी चेष्या भी सदा श्रघ्न्य रहे 1" इसङा नाम शप्रसुन्य कवनम्‌ श्रत 4 द्वस प्रकार श्रनेक वाममार्मो लेखकों ने धर्मास्त की इतति करर दी है! पर श्रन्ति पूरणः के ब्रत-विघान में ठेसी कोद बात नदं मिलती उसमें ब्रतके अवसरपर जौप्रा्यनाक्रौ जानी है वह्‌ काफी गम्मीर प्रौरयम्कि मार्वो कौ वृद्धि करने वाली है उसमें कहा यवा है--

“हे ब्रतपत्ते ! मे कीति, सतान, विद्या, सौभाग्य, घ्रारोग्य दो वृद्ध, निभृता, मोग ओर मृक्ति के उदश्यसे यह्‌ घ्र क्ता 1 है जमतुम्ते { ते सह श्वेष्ठ ब्रत ्रापके सम्मुख ग्रहृण शिया श्रापके प्रभाद से यहं निविघ्न समाप्तो, यदी मेरी प्रार्थना है इस श्रेष्ठ व्रत कँ अ्रहृण- करते परयदियदं पूर्णं रहे श्रौरमेयी सृत्य जायदढो भी भाङ्ग प्रमाय वह्‌ ष्ठि हो जाय

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समस्त विद्धि प्राक्ठ करने के सिये &व्रत-मूति भौर जगतुपूतिका मण्लमें भ्रावादून करतां श्रावक लिये मेरा नवन्कारहो। टै केशव! श्रापमेरे मराकषिष्य मे पिथत रहं ! मन के दारा कलिरत श्रौर मक्तिपू्वंक सर्मापत परचषव्यों से, शुम जलो से, पचागतो षे भ्रापको स्नात करता ) श्राप भरे पारणोके हनन करने वाति होवे उषो प्रकार गर्व श्रौर पृष्वोदक ( मानसिक ) से यह शुभ श्रषयं श्रपितं किया जता इस श्रध्यं, पाद्च तया श्राचमनको श्राप ग्रहण करे धोर सवंदा मुः ्रष्यं देने योग्य बना देवे 1 हे वस्त्र-पते ! इष परम पितर वस्त्र को रवोकरार करे शरोर स्वेदा अच्छे वस्र रादि तथा सुन्दर ण्भू यश श्रमे मुके चमाहित करे है गन्धरूते } भाप सुगन्धि मौर विमल भन्ध ग्रहणं कोनिपे प्रोर मुेप्रापोकी गन्वसे विहीन दनादये 1 प्रोपद्ृन परम बुगन्पिते पूष्णो कोस्वीङार करे प्रः मुभे सर्वदा पुष्पादि से पप्पू षरमे कीष्टेपाकर इस धूप को ग्रटृण करे दे धूपित ! भप मु ुल्दर्‌ धू से खक्ष धुपित्तक्रे इस उपरङी दिदावलिदौष कोस्वीकारकरे'। दहै दोपमूरते ! भाप मु प्रका से षमन्वित भौर सर्वदा उदगति करे 1 हैप्रमे)

रोति रहित, क्रियासे हीन बौर भक्ति धून्येते जो प्रापक पूजाकीहि, वह्‌ सव पृण मानी जानी चाहिए ।“

“यापु ममे चमं प्रदान करे, घन देवे भौर सद्गुणो से युक्त संतान देवे की, विद्या, धानु, स्वगं भरर मोक्ष मूके प्रदान करे 1 हे व्रतो के स्वामिन्‌ ! भेरी स्मारित दम भर्चेना को प्रहणकरके भप यहि पधार दे प्रमो} पापको विगत्रितष्ठो एता ह, दन्तु पूनः यह पपाते प्रोर मुके वरश्रदान कटो दमी भावना को तकर द्ग परय घापङमोविदाकर रहाट +

श्म प्रहार बौभरादना ठेजो मोगव्रत कयि जपेन वे निश्चपंदी प्मोलिमिष सान्ति पौर चमरं-भावषो ददु क्एने वति होने!

स्वप्न थीर्‌ शक्न-- मनुष्य शो द्वारीरिष प्मोर मानन स्विायोतं स्वननमी वदाशु विषयदहै ! पुर्न वर पडृटटए पोर वाघ्यश्ननके दून्यषटोनेषरगी मनुष्य

[ २३

कतार मर ॐ$रेतरेदेतरे अतठे द्यं देत वेजादै जिनं की जगु पवर्थ सम्भावना भी नही हो सक्तो 1 यद्यपि आधुनिक्‌ मनोविज्ञान के ज्ञाताप्नी ने इय सम्वन्परे कुद खोजवोन कौर, पर स्दत्न दर्शन की ग्ननेक धटनावे तेयो विचित्र होती क्रि उनका समाघान वे्ञ.तरिक्‌ सिद्धान्तो द्रम्या बहींटोठा। उदाहरणा भ्रमरी प्रेडीडेन्ट ्रद्राटम निक्नकी पनीनेस्दप्नमेंदेवा क्रि उसे पति कीटहत्याकरदोगर्ईहै 1 एक दिनवाद ही निक्नको एक श्रात्तनायी ने नाटक देखते हए मार हाता इसी प्रकार बौर भो कंहस्वप्न तिहा मं प्रसिद्ध है जिनमे स्वप्न मेदेव हुई वात प्रागे चत्त कर टीक निकली ष्सतेय्य के ्राघार पर मारतोय मनीपिधोने स्वप्न करोसूढम शरीर से सम्बन्धित मान कर विविध प्रकारके स्वप्नोंको युम भ्नौर प्रगुमस्वप्नोको श्रोणी मनँ दाट दिया है भोर उनके ष्व मी निहिदहै। “अनिनि-पुराण"में भी स्वप्नो के फन के सम्बन्धं में एक्‌ अध्याय जिसे युमाशुम स्वर्प्नों का विवेचन श्िाहै। उमे काह कि--“नानिकोद्धोडक्र कर ारीरष्े श्नन्य भागों भेंतृए तथा वृक्न उत्तन्न होर मुरिढत अ्रयदा नग्ड होना, मते वभ््रघारण करना, शरीर में तल मदंन, कीच में लिपटना, जचे चे श्रना, दिवाह होना मीत-गान योना, मूला पर चदृकृर दूलना, पक्षो माग का भक्षण, मावाकेवेट मे प्रवेश्च तरना, चित्ता का ददन, लाल पुष्यो की माना घारण करना, वाराह, घोड़ा, गधा, ऊट की सवारी, चन्द्रमा, सूयं का नदे गिर डाना, गोवर के पानी से स्नान करना, स्पाही से स्नान करना, घर का (र जानः, जेस्मरा वस्व चारणो करना श्र्द ब्यम स्दम। हं उनको त्रिसी घे कट्ना नहीं चाहिए उनक्गो देखने पर फिर सो जाना चाहिए 1 जगवमच्‌ का स्मरणा करने, देव स्नुनि श्रयवा पुष्प मूक्त का पाठ प्रादि करने से उनका दोप मिट ज्वा है

^पदष्ड्‌, महल, दायो, वृपमर पर चदना, दवेत पुष्यो के पेड पर चट्ना, चाल स्फंदं हो जाना, दहु द्देव दस्व षार क्रना, मूर, चन्द्र का ग्रहण, जुम्ःयासंग्रानये जीव दयेन, खीर खाना, रुधिर सनानि करना, दूष पीनः,

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राजा, हाथी, घोडा, सुवणं, वैल, गाय श्रादि का देखना शुभ स्वप्न हते ह,“

यहम कहाग्याहै सि राचरिकेप्रयम प्रहरमे दिखाई पडने वाचे एक वपं मे, दूसरे पहर के ठः मास मे, तीसरे पहर के तीन मासमे सौर चौधे पहर वाते प्रापे मासमे फलदेने वतेति) जोस्वप्न प्रादःहोतेहौ दिताईदे उनका फवदस दिनिमेही प्रक्टदहो भादा दह परे सव स्वप्न सच्चे नहीं चेते थौर यदिरएकरातमेदो गर व्वन्न दिखाई पड़े तो उनमें से पिछ्वा टीका माना जाताहै। जो स्वल शरीरे की श्रस्वस्य दशाम या वेट कै मारीषन भ्रादिकेकारणा दिवाहृदंवे भी निरवंकहोते शुभया भ्रगुम घटनाप्रोकौ पूं सूचना देने वाते स्वप्न कभी-कपी बहुत गम्भीर भ्रवषयें वर ही दिलाई देतेर्टै। भ्रनेक व्यक्ति सदैव भाँत-भांति केस्वप्नदेवा करते, जिनमेसे प्रविवाश जानेपरयादभी नदीं रहते, उनको निरयंक मानना चाटिएि)वे एवः भकार से शारीरिक परस्वस्यना के चिल है, जिनका पदि ययोचित टद्घुये उपचार प्रिया जायसोवेवब्दहो सक्तेदै।

हपारे देशम कौप्रासे शकुन का सम्बन्य हुन चधिक जोडा गधाहै। पजशकौप्रा घरपर वार-वारपभराक्रर वोलताहैतो दते प्रायः क्िसीके परदेण शेपनिकौ मूदनाक्षा तुन समरमना चाटिए्‌ इमो प्रकार यदिव यापी तरपः भयभीत षार रोगा-तादबोलनादहोतो दिसी विज्चेप दुंटना काचि उमङगादापी प्रर वोलना घनो हानि करने वावा होता है फौअ। पदि षोयनेगनाहितोप्मे उत्तमवृद्रागपाहै व्वुत्तङोभो दापनं का साधन मनापा उषष्ाका रोनाद्रयागीकोमे शिपोफेमसे यामरीप्रार कते कर चिहि माना जष्दाटै + "यहि बृत्ता गुहे नृतः लिविदिषाददैको ट्‌ दसम [सना विसो शस्या ङे गाप धया टेमना, उसरेस्वागी द्वि शिनौ मय वदनूवकः होतः रातरि मरमादेतो षोयेका मप जानना कारिष्‌ 1" दनो प्रषाप्योडा भौर हादियो शी दशपोको देल कर स्मद्यराददे धनुपाद व्विजनह | परसाद्य दि विह्ती कै पम्यन्य मेष्ाद् पटन्‌ दून प्ष्दाय मे नरी द्विदा पवा जगद "पाया दट्नाः वाज

[

क्ल एक वहुत प्रमिद्ध राङ्न माना उतर वायु भौर वर्प के च्ह्धोनिभो धुम-पगुम के सूचना मिल सक्ती है रत्नो मे जी युम-अगुम का ध्यान रखने ष्लोकहाग्याहै। प्राचीन काल मे राजा श्रोर वड़े लोग रनों की साला श्नोर भरन्य्रासूपण प्रायः धारण करतेये। जवनी घनीलोग भरगूरीमेंदीग, लान, श्नादि कै नग जडाते है ^रलल-परीक्षा' के अव्वावमें यारा, भरक्तस्नोर दानने की कड दिधियांदो गहै उनमें व्दिपस्पघे उनको चमक, खामा श्नोररङ्घदेषा जाताद्ै! डोस्वामारिक भ्रोरमु दत्ता युक्त होती है दही उत्तम माना ग्याहै योरोप के दाददाद्‌ मी श्रमी तक नप्ने मृष्टो मे दटूमूल्य हीरे लायो कर्तेदे। इद्कलेरडके राजमुङ्ुट मे लगा च्येरतरुरदीयतो जगनु भ्रखिद्ध दै मोर श्रनेकव्यरत्तिञ्ने वहां के राज्यर्बछके लिने वडा कल्यााक्ारी मानते 1 इषौ प्रकार अनेकहीरो कोयोरोतीय लेन ने वहूत दयुम वत्तनायादै। पुस्पं अर स्यां कर लचण--

इसन देदामें क्षी समय दुमादयुम दा.दिचार्‌ इतना श्रविकवदुहूपरा ाक्रिदह्‌ केवल स्वप्न, शक्रुन भादिजंनी सूष््म दिवा रौर पञ्यु-पक्षियो

तक्र सीमिदहन या वरन्‌ पुस्प बोर स्त्रिय[के श्रद्ध युमायुन का निर्णय बधार पर त्रियाजाताथा। इम रुम्बन्धमे दुख

"नेतो को द्धोडकर बिवज़ नेव रौर दन्त युन होते है वद दविुरनक होढा है! जिखन्नि उदरे तीन वलि दोनी है वह 'व्विनोमानु कट्लाताहै) द्धा, मस्तक्त द्ीर वस्व जिनका चोडा होउ दै, उमे शरिविस्तीणं' स्ट्तै है! श्र गुलियां, हृदय, धृषटमाय सौर कटि जिसके प्रसम्त हों वहे "चतुःसमः" होता है 1 सखी चार दाद चन्द्रकी नी आमपदालो होती है वह "चनु होतार! दीनों नवो कौ तारिक. मौह प्रीर वाल चिषठङे काते होते उदे "चतु.ह्ष्यः क्हतेर्है। स्खाभ्ौर मांखये दहित देह यगुम मानाजाठादै [ वह्‌ पर्प घन्य है विसनौ दाणी मधुर भ्मौर ग्रति मस्व हायीके घमान होतो है! ` जिम्‌

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एक गोमवरूपहै एकौ गोन रहता वहे भये रक्षित रहना ६,“

कसी प्रकर स्वयो केलिपरे कहा गया है कि~-ुनील वेशो वलौ, पतते अद्धो वालो, विना लोम वाली, जिषके पैरो फे तरवे समान सूपसे भरमि धौ स्पशं करते है,वह खी युभ होती है जिसका उदर लस्बायमान ष्टो प्रौर रोगो सेसूक्षतहोदहणुभ होती हे 1 जिषकी भृककटियां जुडो हई मरोर कुटिल हौं धह धोगन नहीं मानी जाती जिस स्त्री को कनि उंगली भिर स्पर् महीं श्रिया करतौ वह साक्षतु मृत्यु के समान होती है!“ कुट दि्नोने तो

परीर शद्धो के लक्षलो को सामुद्रिक शास्त्र ( हस्तरेखा शास्त्र } का एक षद ही वनादिषाहै।

स्वास्थ्य रकता श्रीर चिक्िरसाशास्र--

शमर पुराणा मे चिरित्नाशस्वकावर्णनमभोक्यिा गयाहैश्रौर रौ निवारण के लिपे प्नेक पौपधिप) वेला ग! स्वास्थ्यरक्षा सम्बन्धो शान मनुध्य के लिये आवश्यक हैभ्रोर इष रटटिमेश्रन्य परिषि के साध इसका र्णान उचितहीदै) एषदटृष्टिसे "गष्ड्-पुराण' कानाम भौ उत्नेनीयदहै। उशते परोवधिषो का वणन इतने दिष्तारके षाय किया गथा जिषे एकं स्वतम्धप्रन्यहोयेनसकहारहै। पर श्रगिन पुराण मेकेवलनुस्वेष्ी तदी षि गये वरन्‌ स्वारथ्य सम्बन्धो सिद्धान्तो भौर पोदयि-तत्व काभी विवेचन दिया ग्याहैप्मौर रोप निवारण को प्रम्य विधियां भौ बताई गरट्‌ विभिष श्रकारक्षो व्यापियो का नेद दयति हए दत्रे कटा पया है-

"समप्व ष्याधिर्या मानिक, पारोरिक, प्रागन्तुकं भौर सहज-पार प्रकारक त्प्राकरतो जवर, छादी, दुष प्रादि क्तारीरिक व्यापि है) पोप चदि माननिङर्हु। चोट भारि लगजनेतेनो ष्याधिपंदाहो जाती ह। वट यन्तु) भूष घ्नो वृद्धता भादि सहज व्यापिवार्है पौर समया- मुषार्स्वामादिकस्पतेदुवाक्रतोदहै। शारौर्कि पौर मानिका ष्वाधिों बे निवि पृश, गुष्् सष्णापादिदनकरना दाद्‌ चन्द्रवदरके दिनमे चिप्र काभन्दद ददान करने दानाद्मर्गेर्योहेष्युटकायपा जायाकरताष्।

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शनिवार कै दिनि कादानकरे। अ्रश्विनमे मोर म्ीरभन्न कदनं करना चाहवे तिमधुर (दष, धूतं भौर मधु) से डवाद्म्रा कर दूषको भायत्री मन्व्रद्वारा अभ्निसें हृदन करना चाहिए जिस नक्षत्र में व्याधि-घःत हो उसके शुम स्यत मे लि ( विभिन्न षदार्योकौ } देनो चाहिए जमन. त्रिक रोग क्रोध, चिम्ताभ्रादि हेते उनका निवारण करने के पिये मगवयनू कै स्तोभं का पाठ करमा च।हिए 1 इमसे मानिक व्यणवियां नश हौ उातीरै।

“प्रव वात, पित्त क्फ-ये तीन महादोप दौड लयाया करते है टनक्े विषय मेश्रवणच्रो। जोनीप्रन्न दाया जततारहै जामारायमें पहटुच कर च्स्करैदोमाग देतर्है1उमका एकञअदाठोक्टिखूपमेहो जार्ताहै ओर दूमरारससूपं में पते भाग कामलवमजाताहै जो विष्ठा, सूत्र, पमीना प्रादि केसूपरमे वाहर निकल्ताहै1 नाङकामेल, कानका मैल,देहका मेलपभ्रादिकी गणनाभी ठमीमेंकी जातो है 1 दूरे रम मावसे रक्त, माम, भेद, अत्थि भरादिकोक्रम ते उत्पत्ति दौनी दहै। प्रस्थिते मज्डाओौर मज्जा से वीर्यं कौ उत्पत्त होती दै, जिसे राग भ्ौर मो दनततादै। देद,च्यधि वल, शक्ति, ब्ल भौर मानव.की प्रकृति को जान करर वौपश्चि की दक्ति को प्षममःकर वैद्य को चिज्ित्ता करनी चाहिए चिक्त्माके आआरम्भमें श्य को रिक्ता, तिथि, मोम वार, मन्द, दास्णञ्रौरखग्र नकत्र कात्या करदेन चाहिए 1 फिर हरि, गौ, द्विज, चन्द्र" मुय भौर देवगण भादिकी अर्वा करके विद्वान वं्यकौ भोपप काप्रयोग भ्रारम्भ करना चाटिए। कैयटो क्ट्ना चादिए शि “जव इम प्रौपव"को रेता हठो ब्रह्मा, द्य, अ्रश्विनीङ्गमार, सद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्र, सूये, वायु, भ्रभ्नि, समस्ठ श्पिगण प्रोपध समूद श्रौर भूत सद्खतेरो ( रोमोद्ी ) रक्षा करे ऋषियों को रायन की नाति, देवों के श्रमृतक्ौ ठर, नामों को नुधा की वरह यह भौपव ठेरे तिये प्रमाव वाली हो"

चतंमान समय मेन निय्मोका प्रायः लोपो गयाहै। खाञ्चकर डाक्टर चिक्त्छामे ठोदवी-चक्ति कौतर ज्रि रह काघ्यान देना

रे }

श्रादक्षयक ही नही माना जाता पर यदि मनोदिनान दी दिष्टि विगर त्थि भायतो पे नियम्‌ बहुत कुद लाभदायक हँ दैचो क्तो काध्यान करने प्रौर उनकी कृषः प्राह कर्मे कौ भावना रखने भ्रिसी प्रहारफीहानितो हही नटीं सकी 1 चरनु मनःषेत्र मे एक म'म, उत्साह कौ भावना उष्य हती जोस्वा्थ्य क़ सुधारने मे सहायरूहोतीषहै। भ्रनेक व्यक्तितो मान. तिक प्रेरणा ही धरषनी श्रौरदूषरो की व्याचियो का निवारण कसते समथं होते सल्यि चिकित्सा करते समय प्ररणाप्रेद मानसिक वातावरण धनाेनाहरदृशि से उपयोयीदहै।

पुराणकार ने यहमी कहा हि--'व्याधिकामून कार्ण जाकर उसको मिटानेकेल्तिये ही श्रौपध करनी चाहिए ।'' सके लिये वंद्य को पते रोगी की प्रकृति का पना नपाना होतार) अधुदधंदके प्रनुमार मव्य तीन प्ह्योंके हत ै--वात, प्ततिप्रोर कफ ।" वायु रूक्ष, दीत भोर मल होः है, पित्ति दष्एधोर वटु होतार, क्फ स्निग्यश्रोर मधुर क्डागयाहै। ध्न तीयो कै सथान रहने षर्‌ स्वारथ्य उत्तम रहता भौर देहकीवृदधिहोतीदहै जीर अवये विपरीतो जतितो षष्ठे उल्टा परिणाम दिखाई पडते लगता धुर स्म वाते पदायं वफ वृद्धिकरने वत्ते होते है, कदुे, चरपटे प्रर प्रसत वायु ङे बढाने वतते प्रोर वफनादाक होतेह, कटु, अम्ल, लवण रस पतिकौ वदने बते दते टै) तिक्त, मधुरश्रीर कर्ते पित्त कै नाशक होते दै) यहयेवलरतरक्यही गुण नही होय वरदे उपक विपाक फा टुभा फर दैजोषदाधं वोर्योष्सदेते हवे क्फभ्रोर वतक न्षफहोते हपभरौरनो धोनधीषं हतेर्हषे पत्तिक नाद्र होने है धिदिर, वसन्त भरोरप्रौप्ममे प्रमम कफः वा सचय, प्रभोपश्रौर उद्दाम धा कथयता है वर्‌, चस्दश्रीर हैमम्ठमे प्रम वित्त का षछचय, प्रक्नेप भोर उप्र ष्ोता है +

पदभ हाद स--'पव्ययिङ्‌ मोजनषर ततरे प्नौरद्िल्डुत भोजननक्रते मे मपर रोग र्पप्न ह्ूप्राक्ग्तेर 1 वेमोको रोक्नेमेनी दोषों दो उलि रनोट नानिके ऊपर भोग नीचे गृद-प्रोसिय

*

को दष, वित्त, वायु स्थान व्यय ययदहैतो भो गनवक्रने वानदते मोद वादुतोव्दधिपरूरचदेट रर

मनुष्य वाउ, पित्त मोर करस्वस्य दपाक्ठेटै। मैथुने त्त काद कम्मे, नदन्न मोन तया दोक वावु

ग्न दाह करने वान पदरथ, उष्टा मोडनत्या मनं भगनेमरे पित्तपरद्ुधत्त दो जाया करतादै 1 नयसे ओओ पित्त प्रद्वित टोका टै तरि जन पीने दाल, नारो शरन कै मोन कसे वाने ठया खाकर दयन कएने वालो न्त क्फठप्रङुविद हो जाना है इन प्रद्र वायु प्रादि दोषो भकोपर से उत्प दने वात रोमां को ना मामि पमन कर, जे डि लक्षणों दरार जाने जति ह, शमन करने प्रयत्न करे ।"

भ्रागे चलकर इन तीनो दोपो के कारश उद्यन लक्षणों क्येमी बा दै। "ृद्डी का टृटना, सुन्द का कमना स्वाद, मुख का चूव^पन, जण ध्मोकाम्नाना, रोमं { रोगे खदा दोना) ये खव क्छ जन्य व्यारिरोके मगा दो ! नख, मेव, भिरा का पोचपन, युव का कडपरा जयश्च, श्छ { प्याचश्रविक् लगना }, दाढ जौर उप्टाता कौ प्रविक्ता मव पित्त. यद नक्नण रलस्य रहना, नारीरन, का मीठा स्वाद रहना, मपे वस्तुशरो के छेदन की इच्छा रहना वे चद-प्रक्ोप वायु ने उत्व रीगोङे मश हते 1 इन नदो का शमन स्वि प्रक्र हो स्ज्डाहै? स्दिग्ध भोर उपस मोअन, अन्यद्ध. तंन मर्दन सादि चे वादु खन्द दकौ दै। इउ, द्रव भरर निश्रो जमदि तया चन्द्रमा की किरणों का उदन पित्ते प्रकोपना यमन करने वाले है ! हद के माय त्रिफला कय वन, तेन मदेन स्रौ व्यायाम वादि क्फके रकष होने दाते रोगो चमन स्यि कस्ते टै 1 भन्ते मस्व रोगों कनो धान्ठ करने का उपाय मयदावु घ्नमन लौर धरन टवा

दै चया की उपयोनिता--

मारदीय-यमं मं वीद्‌-पात्ा को मटच्वदूं स्यान दिया यया है 1 वत

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-मान समयम तीर्थो का स्वरूप बहत विकृत ठो गया हे जिने देन्न कर विचार श्षौल लोग उनका विरोध कस्ते मोरकिनने ही ग्रन्योमे भी उनक्ते धमं को समन का सचसे छोटा उपाय माना है भरध्यरासमकादियों का कयन्‌ है--

शरप्तु देवा वालानां दिवि देवा मनीषिणाम्‌ 1 काष्ठलोष्ठेपु मूर्खां युक्तस्यात्मनि देवता भरयदि---““सामान्प बुद्धि बाले भगवान्‌ को नदो कुण्डो प्रादि मे सम~ शपते, विदधान उवे दिव्य ( सूक्ष्म) शक्तियोके शूप तें मानते ई, बुदिष्टीन कार पापस को ही भगवान्‌ मान लेते ह, पर भ्रघ्यहम योग का क्ता